श्री द्वारकाधीश गोपाल मंदिर
रत्न जड़ित श्री द्वारकाधीश गोपाल मंदिर
महाराजा दौलतराव शिन्दे की धर्मपत्नी बायजाबाई शिन्दे ने अपने आराध्य देव गोपाल कृष्ण का यह मन्दिर उन्नीसवीं शताब्दी में बनवाया था। यह मन्दिर मराठा स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है।
इस मन्दिर के गर्भगृह में सुसज्जित चाँदी का द्वार विशेष दर्शनीय है।
कहा जाता है कि यह द्वार सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर से गजनी ले जाया गया था।
वहाँ से मुहम्मद शाह अब्दाली इसे लहार लाया था। महादजी सिन्धिया ने उसे प्राप्त किया और इस मन्दिर में उसी द्वार की पुनः प्रतिष्ठा की गई है।
मंदिर के गर्भगृह में लगा रत्न जड़ित द्वार दौलतराव सिंधिया ने गज़नी से प्राप्त किया था, जो सोमनाथ की लूट में वहाँ पहुँच गया था।
मंदिर का शिखर सफेद संगमरमर तथा शेष मंदिर सुन्दर काले पत्थरों से निर्मित है।
मंदिर का प्रांगण और परिक्रमा पथ भव्य और विशाल है।
जन्माष्टमी यहाँ का विशेष पर्व है। बैकुंठ चौदस के दिन महाकाल की सवारी हरिहर मिलन हेतु मध्य रात्रि में यहाँ आती है तथा भस्म आरती के समय गोपाल कृष्ण की सवारी महाकालेश्वर जाती है और वहाँ तुलसी का दल अर्पित किया जाता है।
मंदिर के चाँदी के द्वार यहाँ का एक अन्य आकर्षण है। मंदिर में दाखिल होते है गहन शांति का अहसास होता है। इसके विशाल स्तंभ और सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है।
मंदिर के आस-पास विशाल प्रांगण में सिंहस्थ या अन्य पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते है। मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वती और गरूड़ भगवान की मूर्तियाँ है ये मूर्तियाँ अचल है और एक कोने में वायजा बाई की भी मूर्ति है।
यहाँ जन्माष्टमी के अलावा हरिहर का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
